TODAY
+91 95822 65711सिद्धांत
[01:28, 1/8/2017] +91 95822 65711: 'कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ ग्रेट ब्रिटेन (एम एल)' के द्वारा प्रकाशित किया गया:
अगर आप ना ही फ़ासिस्ट और ना कम्युनिस्ट हैं, तो निश्चित ही आप किसी प्रकार के उदारवादी (लिबरल) विचारधारा वाले गुट के हैं।
"मैं किसी विचारधारा को नहीं मानता", "मुझे पॉलिटिक्स में कोई इंटरेस्ट नहीं", जैसे निरर्थक वाक्यों का इस्तेमाल करने वाले, और खुद को तटस्थ और "मॉडरेट" कहने वाले लोग, राजनीति को एक खेल समझते हैं जिसमे कुछ लोग अपनी पस्सदीदा टीम का समर्थन करते हैं और कुछ लोग इस खेल से ही कोई मतलब नहीं रखते।
लेकिन असल में वे लोग उन मछलियों की तरह होते हैं जो जानते ही नहीं कि वे समुद्र में तैर रहे हैं; और इसी समुद्र की धारा, उदारवाद (लिबरलिस्म) की धारा है। उदारवादी विचारधारा19वी सदी में शासक वर्ग की प्रमुख विचारधारा बन गई। इसके 2 मुख्य सिद्धांत होते हैं: पहला, व्यक्तिगत स्वतंत्रता (individual freedom) और दूसरा, निजी संपत्ति को पवित्र मानना और इसपर आंच भी ना आने देना।
ज़ाहिर है कि ये दोनों बातें एक दूसरे को ही काट देती हैं। इनका एक साथ मतलब ये निकलता है कि निजी संपत्ति वाले लोग आज़ाद रहें और सर्वहारा वर्ग अपनी आज़ादी के सिर्फ सपने देखे। उदारवादी विचारधारा का मकसद होता है इस विवाद पर पर्दा डाले रखना ताकि ये सारे वर्गों तक अपनी बात पंहुचा सके, इसलिए 'व्यक्तिगत आज़ादी' की बात पर इतना ज़ोर डाला जाता है।
यह फ़ासीवाद और रूढ़िवाद (conservatism) के खिलाफ खड़े रहने का दिखावा ज़रूर करती है, लेकिन असल में इन दोनों विचारधाराओं और उदारवादी विचारधारा के बीच काफी पतली रेखा होती है जो अक्सर दिखाई भी नहीं देती। यह गिरगिट की तरह रंग बदल कर खुद को तटस्थता के रंग के पीछे छुपा लेती है।
इसलिए जब भी हम "समाजवाद या बर्बरता!" का नारा देते हैं, तो हमारा मतलब यही होता है कि तटस्थता और समझौते के रास्ते से कभी कोई हल नहीं निकल सकता। संशोधनवाद से कोई रास्ता नहीं निकलने वाला क्योकि वह वर्गों के बीच के 'कॉन्फ्लिक्ट' को कभी नहीं मिटा सकता। सर्वहारा वर्ग का सोषण किये बिना, शासक वर्ग अस्तित्व में रह नहीं सकता। या तो शासक वर्ग अपना राज कायम रखे और उसके द्वारा सोषण जारी रहे, या फिर सर्वहारा वर्ग अपनी ताकत से उनके इस राज को पलट दे; बीच का कोई रास्ता नहीं बचता, और इसी वजह से क्रान्ति का आना अनिवार्य है।
- Ashley Brian
01:28
+91 95822 65711सिद्धांत
+91 95822 65711
Posted by Communist Party of Great Britain (ML):
If you are neither a fascist nor a communist, the likelihood is you are some form of liberal.
There is no such thing as "having no ideology".
People who believe this say things like "I don't take sides", "I'm neutral", "I don't get involved in politics", or "I'm a moderate, the extremes of left and right are as bad as each other". They think politics is like sport, where some people have a favourite team while others don't support anyone.
But, in fact, they are like fish who don't know they are swimming in water. And that water is the ideology of liberalism. Liberalism became the dominant ruling class ideology during the 19th century. It upholds 2 basic tenets: that the individual is (or should be) free and that private property is sacred.
Clearly, these are contradictory - the second qualifies the first as "freedom of those with private property, to the exclusion of those without". The entire liberal project aims to camouflage this contradiction, to appeal to all classes, and reconcile irreconcilable conflicts - hence the emphasis on freedom of the individual.
It positions itself in opposition to fascism and conservatism, but in fact there is a great deal of overlap and blurring of lines. Liberalism is the most chameleon-like of ideologies - it tries to hide itself by appearing 'natural'.
So, when we (communists) say "socialism or barbarism", this is what we mean. There is no compromise, and there is only one solution. Reform cannot resolve the ultimate class contradiction, because the ruling class lives parasitically upon the working class. Either the ruling class get their way, and continue to exploit, or the working class get what they want and overthrow them. There is no middle ground, and this is why revolution is inevitable.
- via Ashley Brian
[01:29, 1/8/2017] +91 95822 65711: इस piece का हिंदी अनुवाद है।
01:29
+91 82987 09680Radheshyam Mishra
+91 95822 65711सिद्धांत
'कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ ग्रेट ब्रिटेन (एम एल)' के द्वारा प्रकाशित किया गया:
अगर आप ना ही फ़ासिस्ट और ना कम्युनिस्ट हैं, तो निश्चित ही आप किसी प्रकार के उदारवादी (लिबरल) विचारधारा वाले गुट के हैं।
"मैं किसी विचारधारा को नहीं मानता", "मुझे पॉलिटिक्स में कोई इंटरेस्ट नहीं", जैसे निरर्थक वाक्यों का इस्तेमाल करने वाले, और खुद को तटस्थ और "मॉडरेट" कहने वाले लोग, राजनीति को एक खेल समझते हैं जिसमे कुछ लोग अपनी पस्सदीदा टीम का समर्थन करते हैं और कुछ लोग इस खेल से ही कोई मतलब नहीं रखते।
लेकिन असल में वे लोग उन मछलियों की तरह होते हैं जो जानते ही नहीं कि वे समुद्र में तैर रहे हैं; और इसी समुद्र की धारा, उदारवाद (लिबरलिस्म) की धारा है। उदारवादी विचारधारा19वी सदी में शासक वर्ग की प्रमुख विचारधारा बन गई। इसके 2 मुख्य सिद्धांत होते हैं: पहला, व्यक्तिगत स्वतंत्रता (individual freedom) और दूसरा, निजी संपत्ति को पवित्र मानना और इसपर आंच भी ना आने देना।
ज़ाहिर है कि ये दोनों बातें एक दूसरे को ही काट देती हैं। इनका एक साथ मतलब ये निकलता है कि निजी संपत्ति वाले लोग आज़ाद रहें और सर्वहारा वर्ग अपनी आज़ादी के सिर्फ सपने देखे। उदारवादी विचारधारा का मकसद होता है इस विवाद पर पर्दा डाले रखना ताकि ये सारे वर्गों तक अपनी बात पंहुचा सके, इसलिए 'व्यक्तिगत आज़ादी' की बात पर इतना ज़ोर डाला जाता है।
यह फ़ासीवाद और रूढ़िवाद (conservatism) के खिलाफ खड़े रहने का दिखावा ज़रूर करती है, लेकिन असल में इन दोनों विचारधाराओं और उदारवादी विचारधारा के बीच काफी पतली रेखा होती है जो अक्सर दिखाई भी नहीं देती। यह गिरगिट की तरह रंग बदल कर खुद को तटस्थता के रंग के पीछे छुपा लेती है।
इसलिए जब भी हम "समाजवाद या बर्बरता!" का नारा देते हैं, तो हमारा मतलब यही होता है कि तटस्थता और समझौते के रास्ते से कभी कोई हल नहीं निकल सकता। संशोधनवाद से कोई रास्ता नहीं निकलने वाला क्योकि वह वर्गों के बीच के 'कॉन्फ्लिक्ट' को कभी नहीं मिटा सकता। सर्वहारा वर्ग का सोषण किये बिना, शासक वर्ग अस्तित्व में रह नहीं सकता। या तो शासक वर्ग अपना राज कायम रखे और उसके द्वारा सोषण जारी रहे, या फिर सर्वहारा वर्ग अपनी ताकत से उनके इस राज को पलट दे; बीच का कोई रास्ता नहीं बचता, और इसी वजह से क्रान्ति का आना अनिवार्य है।
- Ashley Brian
[04:03, 1/8/2017] +91 82987 09680: 



04:03
+91 78144 73282AZAAD
[15:08, 1/8/2017] +91 78144 73282: 

15:08
Com Ajay
[19:18, 1/8/2017] Com Ajay: इंकलाब जिन्दाबाद का नारा देने वाले हसरत मोहानी की 142वीं जयंती पर इंकलाबी सलाम
इंकलाब जिंदाबाद के जिस नारे को लगाकर भगत सिंह और साथियों ने हर किस्म के अन्याय के खिलाफ लड़ाई का प्रतीक बना दिया, उसको Long Live Revolution के तर्जुमे के रूप में देने वाले थे मौलाना हसरत मोहानी। उन्नाव के पास मोहान के छोटे जमींदार परिवार में 1 जनवरी 1875 में जन्मे और अलीगढ में पढ़े हसरत मोहानी भारत की गंगा-जमुनी तहजीब के चलते-फिरते प्रतीक, संपादक, राजनीतिक कार्यकर्त्ता, शायर बहुत रूप में अपनी छाप छोड़ने वाले व्यक्तित्व हैं।
1908 में अपने अख़बार उर्दू-ए-मुअल्ला में अंग्रेजी नीतियों के खिलाफ अज्ञात नाम से लेख छापने पर sedition के जुर्म में 12 महीने कैद बामशक्कत की सजा भुगती क्योंकि एक सच्चे संपादक के नाते लेखक का नाम उजागर नहीं किया। बामशक्कत का मतलब एक और कैदी के साथ मिलकर रोज हाथ चक्की से 37 किलो अनाज पीसना पड़ता था। उसी वक्त लिखी गई गजल का लिंक नीचे है।
1921 में अहमदाबाद में तीन प्रमुख राजनीतिक दलों का सम्मलेन एक ही सप्ताह में हुआ। पहले खिलाफत कांफ्रेंस में हसरत ने पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव पास करा लिया लेकिन बाद में फिर अंग्रेजी डर से प्रस्ताव पलट दिया गया। कांग्रेस की विषय समिति में भी हसरत ने रामप्रसाद बिस्मिल, आदि के सहयोग से पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव पेश किया लेकिन 'महात्माजी' को जैसे ही पता चला तुरंत दौड़कर आये और प्रस्ताव को पास होने से रुकवा दिया। इसके बाद मुस्लिम लीग के सम्मलेन में भी अपने अध्यक्षीय भाषण में यही कहा लेकिन वहां भी वही नतीजा। नतीजे में हुई अहमदाबाद में ही गिरफ़्तारी और दो साल से ज्यादा फिर जेल, लेकिन कांग्रेसियों की तरह आरामवाली नहीं बल्कि सी क्लास की बामशक्कत। इस बार हसरत ने विरोध में काम करने से मना कर दिया तथा और भारी सजाऐं भुगतीं।
1925 में जब कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना के लिए कानपुर में सम्मलेन बुलाया गया तो हसरत मोहानी इसके आयोजनकर्ताओं में तथा स्वागत समिति के अध्यक्ष थे और तभी इन्होंने 'इंकलाब जिंदाबाद' का नारा दिया। हसरत मोहानी संविधान सभा के अकेले सदस्य थे जिन्होंने उसके मौजूद रूप में उस पर दस्तखत करने से इंकार कर दिया था। उन्होंने ही ये पंक्तियाँ भी लिखीं थीं:
गाँधी की तरह बैठ के कातेंगे क्यूँ चरखा
लेनिन की तरह देंगे दुनिया को हिला हम
गजल का लिंक - https://rekhta.org/ghazals/hai-mashq-e-sukhan-jaarii-chakkii-kii-mashaqqat-bhii-hasrat-mohani-ghazals
मूल पोस्ट - Mukesh Tyagi ( https://www.facebook.com/MukeshK.Tyagi )
No comments:
Post a Comment