[08:17, 10/2/2016] AAP Com: ( संदर्भ – इप्टा राष्ट्रीय सम्मेलन, 2, 3 व 4 अक्टूबर, इंदौर )
सार्थक रंग आंदोलन के समक्ष चुनौतिया
भरत मुनि रचित नाट्यशास्त्र को पंचम वेद कहा गया है. शुद्रो के लिए चार वेदो के श्रवण, अध्ययन आदि के प्रतिबंध के बरक्स नाट्यशास्त्र सबके लिए सहज उपलब्ध रहा है. दृश्य व श्रव्य का सन्युक्त माध्यम तथा संवाद, अभिनय, नृत्य, गीत, संगीत का समन्वित कलारूप होने से नाटक की प्रभावशीलता भी व्यापक है. विश्व के महान नाटककार बर्टोल्ट ब्रेख्त ने नाटक की उपयोगिता को रेखांकित करते हुए कहा था कि “ नाटक केवल आनंद देने के लिए नही बल्कि कुछ बताने, सिखाने और आगे बढाने के लिए होता है “, अर्थात नाटक का उद्देश्य – जो है उसे बताना , कैसा होना चाहिए उसको सिखाना तथा है से होना चाहिए के लिए क्या किया जाना चाहिए की प्रक्रिया को आगे बढाने का रास्ता बताना है. इसी बात को उत्पल दत्त ने इस तरह कहा “ रंगमंच का काम आज की वास्तविकता को कलात्मक तरीके से प्रस्तुत करना, साथ ही भविष्य की ओर इंगित करके यह भी बताना है कि वास्तविकता कैसी होनी चाहिए “.
भारतेंदु हरिशचंद्र को आधुनिक हिंदी नाटक का जन्मदाता मानते है, उनका नाटक ‘अंधेर नगरी ‘ आज भी सामयिक है तथा उसके मंचन लगातार होते रहते है. भारतेंदु ने लोकनाट्य की स्थापना न करके सुरूचीपूर्ण साहित्यिक नाटको की जो वकालात की उससे बाद मे जयशंकर प्रसाद जैसे नाटककार इस सीमा तक गए कि रंगमंच के सम्बंध मे यह भारी भ्रम है कि नाटक रंगमंच के लिए लिखे जाए प्रयत्न तो यह होना चाहिए कि नाटक के लिए रंगमंच हो.
साहित्य व कला को लेकर दो दृष्टि समानांतर रूप से चलती रही है. एक के अनुसार कला, कला के लिए है जिसे रूपवादी / भाववादी / कलावादी नाम से जाना जाता है तो दूसरी के अनुसार कला, जनता के लिए है जिसे प्रगतिवादी / जनवादी / मार्क्सवादी नाम से जाना जाता है. कलावाद के समर्थको ने एकओर रूढ प्रयोगवादी व अभिजात्य प्रवृति को तथा दूसरी ओर मनोरंजन के नाम पर अश्लील, भौंडी तथा जनता की रूची को विकृत करने वाली प्रवृति को बढावा दिया है, जिसके बडे उदाहरण के रूप मे पारसी थियेटर तथा आज के लाफ्टर शो को देखा जा सकता है. महान उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद ने कलावादियो को इंगीत करते हुए कहा था “ मै कला को भी उपयोगिता की तुला पर तौलता हू, कला नाम था और आज भी है संकीर्ण रूप पूजा का, उसकी दृष्टि इतनी व्यापक नही जो जीवन संघर्ष मे सौंदर्य को देख सके ”.
साहित्य व कला के जनोन्मुख स्वरूप के पक्ष मे अखिल भारतीय स्तर पर सर्वप्रथम संगठनात्मक पहल के रूप मे 1936 मे प्रगतिशील लेखक संघ का गठन हुआ, जिसने 1939 मे जन नाट्य आंदोलन प्रारम्भ करने का विचार किया तथा 1943 मे भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) का गठन हुआ. भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान व आजादी के बाद इप्टा सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक सच्चाईयो, सवालो और अपेक्षाओ को कलात्मक रूप से नाट्य मंचन के माध्यम से उठाते हुए एक बडा सांस्कृतिक आंदोलन खडा करने मे सफल रही है. पृथ्वीराज कपूर, बलराज साहनी, सुनील जाना, चित्तो प्रसाद, सलिल चौधरी, उदयशंकर, रविशंकर, शील, जोहरा सहगल, हबीब तनवीर, मोनिका मिश्रा, ए.के.हंगल, उत्पल दत्त, बिजान भट्टाचार्य, ऋत्विक घटक, ख्वाजा एहमद अब्बास, नेमिचंद जैन, रेखा जैन, भीष्म साहनी, कैफी आजमी, दीना पाठक, अमृतलाल नागर, फारूख शेख जैसे असंख्य नामचीन कलाकारो व साहित्यकारो ने इस सांस्कृतिक आंदोलन को सशक्त किया है. सामूहिक लेखन, गहन विमर्श व मंचन की परम्परा के साथ नाटक को प्रेक्षागृह की सीमा से बाहर निकाल नुक्कड, चौराहो, चौपालो तक इस विधा का विस्तार कर सामान्यजन व उसके सरोकारो से जोडने मे इप्टा ने अहम भूमिका का निर्वाह किया है.
विभाजन और विघटन की प्रवृति से यह सांस्कृतिक आंदोलन अछूता नही रहा है तथा आज प्रगतिशील लेखक संघ, जन नाट्य संघ, जनवादी लेखक संघ, जन नाट्य मंच, जन संस्कृति मंच, सहमत जैसे राष्ट्रीय संगठनो के अतिरिक्त अनेको क्षेत्रीय व स्थानीय सांस्कृतिक संगठन सक्रिय है, जिनकी अपनी सार्थक भूमिका है परंतु विभाजन / बिखराव के परिणाम स्वरूप आंदोलन की धार कुंद हुई है. नाटक की क्षमता को रेखांकित करते हुए जनकवि व नाटककार शील ने कहा था “ नाटक मनुष्य की ज्ञानेंद्रियो और कर्मेंद्रियो के संगठन और मानवीय प्रवृतियो के समंवय द्वारा शिक्षित, अशिक्षित, निरक्षर, गूंगो, बहरो तक को शिक्षित करने का सबल माध्यम है.
आर्थिक भूमंडलीकरण के दौर मे आवारा पूंजी के मुक्त प्रवाह ने मनुष्य व मूल्य को हाशिए पर कर दिया है तथा अपसंस्कृति के प्रसार के अनेको माध्यम लगातार सक्रिय है. प्रगतिशील – जनवादी सांस्कृतिक आंदोलन को एकजूट होकर मनुष्य व मूल्य के पक्ष मे प्रबल सांस्कृतिक आंदोलन निरंतर चलाने की आवश्यकता है. सुप्रसिद्ध आलोचक डा. मेनेजर पांडेय ने जनवादी रंगमंच को दो तरह की प्रवृतियो से संघर्ष करने की ओर इंगित किया है – एक तो आधुनिकतावादी और आभिजात्य प्रवृति से और दूसरी अश्लील, भौंडी तथा जनता की रूची को विकृत करने वाली प्रवृति से, यह एक बडी चुनौती है जिस पर गम्भीरता से विचार करने की जरूरत है.
इप्टा की स्थापना के 73 वर्ष बाद यह पहला अवसर है जब मध्यप्रदेश मे दिनांक 2, 3 व 4 अक्टूबर को चौदहवा राष्ट्रीय सम्मेलन इंदौर मे होने जा रहा है. देश के 20 राज्यो की एक सौ से अधिक इकाईयो के 700 कलाकारो, साहित्यकारो व प्रतिनिधियो के इस सम्मेलन मे सहभागिता की अपेक्षा की जा रही है. वरिष्ठ फिल्म निर्देशक एम.एस. सथ्यु सम्मेलन, सुप्रसिद्ध डाक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता आनंद पटवर्धन तथा वरिष्ठ कलाकार व इप्टा के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री रणवीरसिन्ह ने सम्मेलन व सांस्कृतिक जन महोत्सव का शुभारम्भ किया. इस अवसर पर रंगयात्रा, कविता पोस्टर, फोटोग्राफ व चित्रकला प्रदर्शनी के साथ विभिन्न केंद्रो पर गायन, नाटक व नुक्कड नाटक के मंचन भी किए जाएंगे. उम्मीद है यह सम्मेलन आज के परिदृश्य मे प्रगतिशील – जनवादी साहित्यिक व सांस्कृतिक संगठनो की सहयोगात्मक व रचनात्मक एकता व नए संकल्प के साथ जनोन्मुखी सांस्कृतिक आंदोलन की गतिविधियो को तीव्र करने मे उत्प्रेरक का काम करेगा.
(साभार इप्टा)