Monday, 26 December 2016

वामपन्थी” कम्युनिज़्म

जीवन का तकाज़ा पूरा होकर रहेगा। बुर्जुआ वर्ग को भागदौड़ करने दो, पागलपन की हद तक क्रुद्ध होने दो, हद पार करने दो, मूर्खताएँ करने दो, कम्युनिस्टों से पेशगी में ही प्रतिशोध लेने दो, गुज़रे कल के और आने वाले कल के सैकड़ों, हज़ारों, लाखों कम्युनिस्टों को (हिन्दुस्तान में, हंगरी में, जर्मनी में, आदि) कत्ल करने का प्रयत्न करने दो। ऐसा करके, बुर्जुआ वर्ग उन्हीं वर्गों की तरह पेश आ रहा है जिनके लिए इतिहास मौत का हुक़्म सुना चुका है। कम्युनिस्टों को जानना चाहिए कि भविष्य हर हाल में उनका है, इसलिए हम महान क्रान्तिकारी संघर्ष में उग्रतम उत्साह के साथ-साथ बहुत शान्ति और बहुत धीरज से बुर्जुआ वर्ग की पागलपनभरी भागदौड़ का मूल्यांकन कर सकते हैं, और हमें करना ही चाहिए।
लेनिन 
(“वामपन्थी” कम्युनिज़्म: एक बचकाना मर्ज़)

Sunday, 25 December 2016

कार्ल मार्क्स के दस प्रमुख सूत्र वाक्य

  1. पूंजी मृत श्रम है, जो पिशाच की तरह केवल जीवित श्रमिकों का खून चूस कर जिंदा रहता है।
  2. हर किसी से उसकी क्षमता के अनुसार, हर किसी को उसकी जरूरत के अनुसार।
  3. दुनिया भर के मजदूरों एकजुट हो जाओ, तुम्हारे पास खोने को कुछ नहीं है सिवाये अपनी जंजीरों के।
  4. महान सामाजिक बदलाव महिलाओं के उत्थान के बिना असंभव हैं।
  5. मानव मस्तिष्क जो न समझ सके, धर्म उससे निपटने की नपुंसकता है।
  6. सामाजिक प्रगति समाज में महिलाओं को मिले स्थान से मापी जा सकती है।
  7. जरूरत तब तक अंधी होती है जब तक उसे होश न आ जाए, आजादी जरूरत की चेतना होती है।
  8. लोगों की खुशी के लिए पहली आवश्यकता है- धर्म का अंत।
  9. कंजूस एक पागल पूंजीपति है, पूंजीपति एक तर्क संगत कंजूस।
  10. धर्म लोगों के लिए अफीम की तरह है।

Wednesday, 26 October 2016

महान रूसी अक्‍तुब्‍ार क्रांति का विश्‍व-ऐतिहासिक महत्‍व और उसके कुछ ठोस सबक

सर्वहारा अखबार
महान रूसी अक्‍तुब्‍ार क्रांति का विश्‍व-ऐतिहासिक महत्‍व और उसके कुछ ठोस सबक
(किस्‍तों में) पार्ट - 1
25 अक्‍तुबर 1917 (नये कैलेंडर के अनुसार 7 नवंबर 1917) के दिन, आज से 99 वर्ष पूर्व, रूस में बोल्‍शेविकों द्वारा संगठित सर्वहारा समाजवादी क्रांति ने पूँजीपति वर्ग का तख्‍ता पलट दिया था और सर्वहारा वर्ग के अधिनायकत्‍व की स्‍थापना की थी। 18 मार्च 1871 के दिन पेरिस कम्‍यूून की स्‍थापना और फिर 3 महीने के अंदर ही (28 मई 1871 को ) उसके पतन के बाद विश्‍वपूँजीवाद की चूल हिला देने वाली मजदूर-तेहनतकश वर्ग की यह पहली महान ऐतिहासिक कार्रवाई थी। इस क्रांति ने एक संक्रमणकारी सर्वहारा राज्‍य को जन्‍म दिया और मजदूर वर्ग के हमारे रूसी पूर्वजों ने एक नयी शोषणमुक्‍त समाज व्‍यवस्‍था बनाने के अपने चिरकालिक स्‍वप्‍न को अपनी आँँखों के समक्ष साकार हाेते देखा। पॅूंजीवाद पर दृढ़ता से विजय पाते ही उस पूँजीवादी महामारी - प्रत्‍येक कुछ वर्षों के अंतराल पर 'अतिउत्‍पादन' के कारण बार-बार प्रकट होने वालेे आर्थिक संकट और विनाश की पूँजीवाद की लाइलाज बीमारी - पर भी विजय पा लिया गया जो आज भी सभी पॅूंजीवादी मुल्‍कों में अनिवार्य रूप से पायी जाती है। विश्‍वपूँूँजीवाद का गला घोंट देने वाली 1930 के दशक की वैश्विक महामंदी के दौरान भी सोवियत अर्थव्‍यवस्‍था का अत्‍यधिक ऊँचे दर से विकास करना इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। मशीनीकरण से बेरोजगारी की समस्‍या की तीव्रता बढ़ना पूँजीवादी विकास की एक आम प्रवृत्ति है, लेकिन सोवियत समाजवादी विकास ने इसे भी अतीत की चीज बना दिया था। उपरोक्‍त महामंदी के ठीक बीचोंबीच सोवियत कृषि में अत्‍यंत तेजी से मशीनीकरण हुआ, लेकिन इससे बेरोजगारों की कोई फौज खड़ी नहीं हुई। ऐसी तेजी पूँजीवादी मुल्‍कों में बेरोजगारी को विस्‍फोटक स्‍तर पर पहुँचा देती। उल्‍टे, यह हुआ कि मशीनीकरण से कृषि से मुक्‍त हुए लाखों-करोड़ों लोगों ने समाजवादी औद्योगीकरण में हाथ बंटाये और इसके सभी मायनों में भागीदार बने। यह एक अकाट्य सच्‍चाई है कि स्‍टालिन काल तक सोवियत यूनियन में मशीनीकरण ने न तो किसी की रोजी-रोटी छीनी और न ही नई गगनचुंबी सोवियत औद्योगिक सभ्‍यता के मलबे के नीचे गरीब, मेहनतकश व जन साधारण लोगों की जिंदगियों को दफन होना पड़ा। जबकि दूसरी तरफ, प्रत्‍येक पूँजीवादी मुल्‍क में विकास के साथ-साथ ऐसा ही होता आया है और आज भी हो रहा है। सोवियत समाजवादीी अर्थव्‍यवस्‍थाा में सोवियत मजदूर व मेहनतकश व किसान सभी नवीन सभ्‍यता के निर्माता भी थे और इसके स्‍वामी भी। राेजगार और काम के अधिकार की सौ फीसदी गारंटी तो थी ही, श्रम की गरिमा को भी प्रतिष्ठित किया गया अर्थात 'जो कााम नहीं करेगा, वह खायेगा भी नहीं' के मूलमंत्र को सोवियत संविधान की आत्‍मा बना दिया गया। (* ARTICLE 12 of the Soviet Constitution constituted in 1936 under Stalin's leadership reads as such - "In the U.S.S.R. work is a duty and a matter of honour for every able-bodied citizen, in accordance with the principle: He who does not work, neither shall he eat." The principle applied in the U.S.S.R. is that of socialism : "From each according to his ability, to each according to his work.")
आज जब कि पूरे विश्‍व में भुुखमरी, कुपोषण और बेरोजगारी की समस्‍या का कोई समाधान नहीं हुआ, उल्‍टे इसका साम्राज्‍य और भी ज्‍यादा फैलता गया ; जब कि इतना ही नहीं मानवजाति के महाविनाश की आहटें भी सुनाई देने लगी हैं तथा प्रकृति के अवैज्ञानिक पूँजीवादी अतिदोहन के कारण पृथ्‍वी का अस्तित्‍व भी संकट में पड़ता दिख रहा है, तो रूसी अक्‍तुबर समाजवादी क्रांति आज हमारी चाहत नहीं अपितु हमारेे अस्तित्‍व के लिए, पूरी मानवजाति के अस्तित्‍व की रक्षा के लिए हमारी परम आवश्‍यकता के रूप में प्रकट हो रहे है। भारत में ही नहीं, पूरी दुनिया में आबादी की बहुसंख्‍या के उत्‍तरोत्‍तर संपतिहरण व स्‍वत्‍वहरण्‍ के आधार पर खड़ी और कार्यरत यह पूँजीवादी-साम्राज्‍यवादी व्‍यवस्‍था अब सभ्‍यता के विकास में रोड़े ही नहीं अटका रही है अपितु इस अनमोल आधुनिक सभ्‍यता का भक्षण कर रही है, इसे नष्‍ट और बर्बाद कर रही है। पूरे विश्‍व में अतिप्रचुरता के बीच घोर दारिद्रय का बर्बर दृश्‍य इसका ही प्रमाण है। आज के विश्‍व की ऐसी आदमखोर अवस्‍था अपने आप में वह एक बड़ा कारण है जिसकी वजह से हमारे लिए और पूरी मानवजाति के लिए नवंबर क्रांति के पैगाम को एक बार फिर से पूरे शिद्दत के साथ याद करनाा जरूरी हो गया है। क्‍या है नवंबर क्रांति का? वह पैगाम यह है कि पूँजीवाद पूरी तरह मानवद्रोही बन चुका है और इसे इतिहास और समााज के रंगमंच से हटाने का वक्‍त आ चुका है, समाज की ड्राइविंग सीट से इसे उतार फेंकने का कार्यभार, जो पहले से ही उपस्थि‍त हो चुका था आज फौरी जरूरत बन चुका है और इतिहास के दरबार से न्‍याय की वह पर्ची कट चुकी है जिसमें लिखा है कि मौत बांटने वाली इस आदमखोर पूँजीवादी व्‍यवस्‍था को तख्‍त पर लटकाने में देरी करना इतिहास के न्‍याय की अवमानना होगी। आज इस पैगाम को याद करने का नहीं, इसे लागू करने के लिए पूरे शिद्दत से लग जाने का वक्‍त है।
खास भारत की बात करें, तो इस पैगाम का महत्‍व कई अर्थों में बढ़ जाता है। विगत कई दशकों के दौरान ऊपर से जारी राज्‍य-प्रायोजित सुधारों द्वारा हुए क्रमिक व मंद पूँजीवादी विकास का घोर अंतरविरोधी, प्रतिक्रियावादी व घिनौना स्‍वरूप आज अपने नग्‍नतम रूपों में हम सबके सामने प्रकट हो रहा है, उदघाटित हो रहा है। भारत की संपदा और यहाँँ के जन साधारण खासकर मजदूरों-मेहनतकशों के श्रम के शोषण व लूट का शायद यह सर्वाधिक निर्लज्‍ज व निष्‍ठुर दौर है जिसके हम सब गवाह बन रहे हैं। इसकी विद्रुप तस्‍वीर हर कहीं देखी जा सकती है। एक तरफ आँखे चौंधिया देने वाले ऐश्‍वर्य के चंद टापू दिखाई देते हैं, तो दूसरी तरफ कंगाली और दरिद्रता का महासमुद्र नजर आता है। एक तरफ रात-दिन गुलछर्रे उड़ाते सुविधा-संपन्‍न अतिधनाड्य मुट्ठी भर लोगों की एक छोटी सीमित दुनिया उग आई है, तो दूसरी तरफ कुंठा, हताशा, कुपोषण, कर्जग्रस्‍तता, भूख, कुपोषण और बीमारी से बजबजाती, नरक से भी बदतर, गिरती-पड़ती और बदहबास एक अलग विशाल दुनिया उठ खड़ी हुई है जो लगातार फैलती और विस्‍तारित होती जा रही है। आम लोगों के दुखों का मानों कोई अंत ही न हो। ऐश्‍वर्य और दारिद्रय का यह घिनौना वैपरित्‍य आज निर्लज्‍जता की सारी हदेंं लांघ चुका है।
कहने की जरूरत नहीं है कि ऐसी बेरहम परिस्थितियाँँ दिन-प्रतिदिन क्रांतिकारी परिस्थिति को परिपक्‍व बना रहीं हैंं। ऐसेे में नवंबर समाजवादी क्रांति के व्‍यवहारिक व सैद्धांतिक दोनों तरह के अनुभवों का एक सटीक आकलन करना भारत के कम्‍युनिस्‍टों का काा एक बड़ा काम है। रूसी बोल्‍शेविकों की क्रांतिकारी तैयारी के पूरे काल का सावधानी से सार संकलन करना और फिर उससे मिले सबकों को पूरी तरह आत्‍मसात करना आज हमारी फौरी जरूरत बन चुकी है। भारत में जिस तरह से फासीवाद अपने विजय के तरफ कदम बढ़ाता जा रहा है वह इसे और भी फौरी और मौजूं बना दे रहा है। फासीवाद के खिलाफ हमारी मूहिम को किस तरह अक्‍तुबर क्रांति के सबकों के साथ मिलाया जाये और कैसे बिना पीछे हटते हुए दोनों कार्यभारों को एक ही रणनीति के तहत संयुक्‍त किया जाए यह आज का हमारा सबसे महत्‍वपूर्ण युगीन कार्यभार है जो यह माँँग कर रहा है कि हम नवंबर क्रांंति के अनुभवों को, इस क्रांति की तैयारी में आये तमाम नुकीले मोड़ों को और बिना किसी सांगठनिक टूट और बिखराव के कार्यनीतियों व रणनीतियों में लचीलेपन को लागू करने की बोल्‍शेविक विलक्षणता के स्रोतों को यानि संपूणता में बोल्‍शेविक क्राति के समग्र विकासक्रम को काफी नजदीकी से समझा जाये। आइये, रूसी नवंबर क्रांति के ठोस सबकों में से कुछ के बारे में हम यहाँँ बात करें। (क्रमश: जारी)

Tuesday, 25 October 2016

रूसी समाजवादी क्रांति

सर्वहारा अखबार 
पुराने कैलेंडर के अनुसार बोल्शेविकों के नेतृत्व में आज ही के दिन (25 अक्टूबर 1917) महान रूसी समाजवादी क्रांति सम्पन्न हुई थी। वैसे अब इसे नवम्बर क्रांति के रूप में ज्यादा याद करते हैं जिसके अनुसार यह क्रांति 7 नवम्बर 1917 को सम्पन्न हुई थी। इसी के साथ हम रूसी समाजवादी क्रांति के शताब्दी वर्ष में प्रवेश कर चुके हैं। आइये, पूरे जोश से पूरे वर्ष (7 नवम्बर 2016 से 7 नवम्बर 2017 तक) में हम यह प्रचारित करें कि एक समय ऐसा था जब इस दुनिया के एक बड़े देश सोवियत यूनियन में शोषणविहीन व्यव्यस्था कायम हुई थी और जो 34 सालों तक न सिर्फ टिकी रही, अपितु वे सारे महान रिकॉर्ड अपने नाम हासिल कर लिए थे जिसे हासिल करने में 200 सालों का बूढ़ा पूँजीवाद जीवनपर्यंत असफल रहा। रूसी सोवियत समाजवाद एक ऐसा राज्य था जो बेरोजगारी और आर्थिकी मंदी, जो आज के आधुनिक युग में सबसे बड़ी पूँजीवादी महामारी बन चुकी है, से पूरी तरह मुक्त था। इतना ही नहीं इसने फासीवाद को द्वितीय विश्वयुद्ध में भारी कुर्बानी देकर जिस तरह शिकस्त दी और मानवजाति की रक्षा की, उसने साबित कर दिया कि सर्वहारा राज्य और सर्वहारा जनतंत्र ही मानवजाति का भविष्य है जिससे होकर मानवताजाति मानव द्वारा मानव के शोषण से पूरी तरह मुक्त और नेशन, जेंडर तथा कास्ट की असमानता सहित अन्य सभी तरह के उत्पीड़न का खात्मा कर देने वाले समाज को बनाने और पुनर्गठित करने का कार्यभार पूरा करेगी। एकमात्र हम सर्वहारा राज्य से गुजरकर ही हम पूरी तरह से मुक्त मानव का दिग्दर्शन कर सकेंगे। तभी मानवजाति समानता के अधिकार के संकुचित पूँजीवादी मानकों के उस पार यानि पूरी तरह से एक नए क्षितिज में छलांग लगा सकेगी। आइये, इस नए क्षितिज के द्वार खोलने वाली रूसी समाजवादी क्रांति शताब्दी वर्ष के आगमन का दिल खोलकर स्वागत करें और सालों भर इसकी यादों और उपलब्धियों को पूरे जनगण में प्रचारित करें और उससे सबक और हिम्मत ग्रहण करें।
महान अक्टूबर रूसी समाजवादी क्रांति जिंदाबाद!
विश्व-सर्वहारा के महान शिक्षक कामरेड लेनिन और कामरेड स्तालिन अमर हैं!
पूँजीवाद-साम्राज्यवाद की हार और मज़दूर वर्ग की विजय होकर रहेगी!!

Saturday, 1 October 2016

नाटक: इप्टा



⁠⁠[08:17, 10/2/2016] AAP Com: ⁠⁠⁠( संदर्भ – इप्टा राष्ट्रीय सम्मेलन, 2, 3 व 4 अक्टूबर, इंदौर ) सार्थक रंग आंदोलन के समक्ष चुनौतिया भरत मुनि रचित नाट्यशास्त्र को पंचम वेद कहा गया है. शुद्रो के लिए चार वेदो के श्रवण, अध्ययन आदि के प्रतिबंध के बरक्स नाट्यशास्त्र सबके लिए सहज उपलब्ध रहा है. दृश्य व श्रव्य का सन्युक्त माध्यम तथा संवाद, अभिनय, नृत्य, गीत, संगीत का समन्वित कलारूप होने से नाटक की प्रभावशीलता भी व्यापक है. विश्व के महान नाटककार बर्टोल्ट ब्रेख्त ने नाटक की उपयोगिता को रेखांकित करते हुए कहा था कि “ नाटक केवल आनंद देने के लिए नही बल्कि कुछ बताने, सिखाने और आगे बढाने के लिए होता है “, अर्थात नाटक का उद्देश्य – जो है उसे बताना , कैसा होना चाहिए उसको सिखाना तथा है से होना चाहिए के लिए क्या किया जाना चाहिए की प्रक्रिया को आगे बढाने का रास्ता बताना है. इसी बात को उत्पल दत्त ने इस तरह कहा “ रंगमंच का काम आज की वास्तविकता को कलात्मक तरीके से प्रस्तुत करना, साथ ही भविष्य की ओर इंगित करके यह भी बताना है कि वास्तविकता कैसी होनी चाहिए “. भारतेंदु हरिशचंद्र को आधुनिक हिंदी नाटक का जन्मदाता मानते है, उनका नाटक ‘अंधेर नगरी ‘ आज भी सामयिक है तथा उसके मंचन लगातार होते रहते है. भारतेंदु ने लोकनाट्य की स्थापना न करके सुरूचीपूर्ण साहित्यिक नाटको की जो वकालात की उससे बाद मे जयशंकर प्रसाद जैसे नाटककार इस सीमा तक गए कि रंगमंच के सम्बंध मे यह भारी भ्रम है कि नाटक रंगमंच के लिए लिखे जाए प्रयत्न तो यह होना चाहिए कि नाटक के लिए रंगमंच हो. साहित्य व कला को लेकर दो दृष्टि समानांतर रूप से चलती रही है. एक के अनुसार कला, कला के लिए है जिसे रूपवादी / भाववादी / कलावादी नाम से जाना जाता है तो दूसरी के अनुसार कला, जनता के लिए है जिसे प्रगतिवादी / जनवादी / मार्क्सवादी नाम से जाना जाता है. कलावाद के समर्थको ने एकओर रूढ प्रयोगवादी व अभिजात्य प्रवृति को तथा दूसरी ओर मनोरंजन के नाम पर अश्लील, भौंडी तथा जनता की रूची को विकृत करने वाली प्रवृति को बढावा दिया है, जिसके बडे उदाहरण के रूप मे पारसी थियेटर तथा आज के लाफ्टर शो को देखा जा सकता है. महान उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद ने कलावादियो को इंगीत करते हुए कहा था “ मै कला को भी उपयोगिता की तुला पर तौलता हू, कला नाम था और आज भी है संकीर्ण रूप पूजा का, उसकी दृष्टि इतनी व्यापक नही जो जीवन संघर्ष मे सौंदर्य को देख सके ”. साहित्य व कला के जनोन्मुख स्वरूप के पक्ष मे अखिल भारतीय स्तर पर सर्वप्रथम संगठनात्मक पहल के रूप मे 1936 मे प्रगतिशील लेखक संघ का गठन हुआ, जिसने 1939 मे जन नाट्य आंदोलन प्रारम्भ करने का विचार किया तथा 1943 मे भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) का गठन हुआ. भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान व आजादी के बाद इप्टा सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक सच्चाईयो, सवालो और अपेक्षाओ को कलात्मक रूप से नाट्य मंचन के माध्यम से उठाते हुए एक बडा सांस्कृतिक आंदोलन खडा करने मे सफल रही है. पृथ्वीराज कपूर, बलराज साहनी, सुनील जाना, चित्तो प्रसाद, सलिल चौधरी, उदयशंकर, रविशंकर, शील, जोहरा सहगल, हबीब तनवीर, मोनिका मिश्रा, ए.के.हंगल, उत्पल दत्त, बिजान भट्टाचार्य, ऋत्विक घटक, ख्वाजा एहमद अब्बास, नेमिचंद जैन, रेखा जैन, भीष्म साहनी, कैफी आजमी, दीना पाठक, अमृतलाल नागर, फारूख शेख जैसे असंख्य नामचीन कलाकारो व साहित्यकारो ने इस सांस्कृतिक आंदोलन को सशक्त किया है. सामूहिक लेखन, गहन विमर्श व मंचन की परम्परा के साथ नाटक को प्रेक्षागृह की सीमा से बाहर निकाल नुक्कड, चौराहो, चौपालो तक इस विधा का विस्तार कर सामान्यजन व उसके सरोकारो से जोडने मे इप्टा ने अहम भूमिका का निर्वाह किया है. विभाजन और विघटन की प्रवृति से यह सांस्कृतिक आंदोलन अछूता नही रहा है तथा आज प्रगतिशील लेखक संघ, जन नाट्य संघ, जनवादी लेखक संघ, जन नाट्य मंच, जन संस्कृति मंच, सहमत जैसे राष्ट्रीय संगठनो के अतिरिक्त अनेको क्षेत्रीय व स्थानीय सांस्कृतिक संगठन सक्रिय है, जिनकी अपनी सार्थक भूमिका है परंतु विभाजन / बिखराव के परिणाम स्वरूप आंदोलन की धार कुंद हुई है. नाटक की क्षमता को रेखांकित करते हुए जनकवि व नाटककार शील ने कहा था “ नाटक मनुष्य की ज्ञानेंद्रियो और कर्मेंद्रियो के संगठन और मानवीय प्रवृतियो के समंवय द्वारा शिक्षित, अशिक्षित, निरक्षर, गूंगो, बहरो तक को शिक्षित करने का सबल माध्यम है. आर्थिक भूमंडलीकरण के दौर मे आवारा पूंजी के मुक्त प्रवाह ने मनुष्य व मूल्य को हाशिए पर कर दिया है तथा अपसंस्कृति के प्रसार के अनेको माध्यम लगातार सक्रिय है. प्रगतिशील – जनवादी सांस्कृतिक आंदोलन को एकजूट होकर मनुष्य व मूल्य के पक्ष मे प्रबल सांस्कृतिक आंदोलन निरंतर चलाने की आवश्यकता है. सुप्रसिद्ध आलोचक डा. मेनेजर पांडेय ने जनवादी रंगमंच को दो तरह की प्रवृतियो से संघर्ष करने की ओर इंगित किया है – एक तो आधुनिकतावादी और आभिजात्य प्रवृति से और दूसरी अश्लील, भौंडी तथा जनता की रूची को विकृत करने वाली प्रवृति से, यह एक बडी चुनौती है जिस पर गम्भीरता से विचार करने की जरूरत है. इप्टा की स्थापना के 73 वर्ष बाद यह पहला अवसर है जब मध्यप्रदेश मे दिनांक 2, 3 व 4 अक्टूबर को चौदहवा राष्ट्रीय सम्मेलन इंदौर मे होने जा रहा है. देश के 20 राज्यो की एक सौ से अधिक इकाईयो के 700 कलाकारो, साहित्यकारो व प्रतिनिधियो के इस सम्मेलन मे सहभागिता की अपेक्षा की जा रही है. वरिष्ठ फिल्म निर्देशक एम.एस. सथ्यु सम्मेलन, सुप्रसिद्ध डाक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता आनंद पटवर्धन तथा वरिष्ठ कलाकार व इप्टा के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री रणवीरसिन्ह ने सम्मेलन व सांस्कृतिक जन महोत्सव का शुभारम्भ किया. इस अवसर पर रंगयात्रा, कविता पोस्टर, फोटोग्राफ व चित्रकला प्रदर्शनी के साथ विभिन्न केंद्रो पर गायन, नाटक व नुक्कड नाटक के मंचन भी किए जाएंगे. उम्मीद है यह सम्मेलन आज के परिदृश्य मे प्रगतिशील – जनवादी साहित्यिक व सांस्कृतिक संगठनो की सहयोगात्मक व रचनात्मक एकता व नए संकल्प के साथ जनोन्मुखी सांस्कृतिक आंदोलन की गतिविधियो को तीव्र करने मे उत्प्रेरक का काम करेगा.
(साभार इप्टा)

Tuesday, 27 September 2016

वर्ग चेतना - भगत सिंह

शहीदे आज़म भगतसिंह के 109वें जन्‍मदिवस के अवसर पर
"लोगों को आपस में लडऩे से रोकने के लिए वर्ग चेतना की जरूरत है। गरीब मेहनतकशों व किसानों को स्पष्ट समझा देना चाहिए कि तुम्हारे असली दुश्मन पूँजीपति हैं, इसलिए इनके हथकण्डे से बचकर रहना चाहिए और इनके हत्थे चढ़ कुछ न करना चाहिए। संसार के सभी गरीबों, चाहे वे किसी भी जाति, रंग, धर्म या देश के हों, अधिकार एक ही हैं। तुम्हारी भलाई इसी में हैं कि तुम धर्म, रंग, नस्ल और राष्ट्रीयता व देश के भेदभाव मिटाकर एक हो जाओ. . .।”
- भगत सिंह

Sunday, 25 September 2016

फ़िनलैंड की स्वतंत्रता

अमरीकी लेखिका व पत्रकार अन्ना लुई स्ट्रांग की प्रसिद्ध पुस्तक "स्तालिन युग" से कुछ अंश :-
फ़िनलैंड की स्वतंत्रता तो बोल्शेविक क्रांति का सीधा तोहफा थी। जब जार का पतन हो गया तो फ़िनलैंड ने स्वतंत्रता की मांग की। तब वह रूसी साम्राज्य का हिस्सा था। केरेंसकी सरकार ने इसे नामंजूर कर दिया। ब्रिटेन, फ्रांस और अमेरिका भी तब फ़िनलैंड की स्वतंत्रता के पक्षधर नहीं थे। वे नहीं चाहते थे कि पहले विश्वयुद्ध में उनका मित्र रहा जारशाही साम्राज्य टूट जाए।
बोल्शेविकों के सत्ता सँभालते ही राष्ट्रीयताओं से जुड़ी समस्याओं के मंत्री स्तालिन ने इस बात को आगे बढाया कि फ़िनलैंड के अनुरोध को स्वीकार कर लिया जाए। उन्होंने कहा था: 'फिनिश जनता निश्चित तौर पर स्वतंत्रता की मांग कर रही है इसलिए "सर्वहारा का राज्य" उस मांग को मंजूर किए बिना नहीं रह सकता।'