तुम्हारे धर्म की क्षय | राहुल सांकृत्यायन | Tehelka Hindi: वैसे तो धर्मों में आपस में मतभेद है. एक पूरब मुंह करके पूजा करने का विधान करता है, तो दूसरा पश्चिम की ओर. एक सिर पर कुछ बाल बढ़ाना चाहता है, तो दूसरा दाढ़ी. एक मूंछ कतरने के लिए कहता है, तो दूसरा मूंछ रखने के लिए. एक जानवर का [...]
‘मजहब तो है सिखाता आपस में बैर रखना. भाई को है सिखाता भाई का खून पीना.’
Monday, 27 February 2017
हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन का घोषणापत्र
http://naubhas.in/archives/1066
हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन का घोषणापत्र
लाहौर कांग्रेस में बाँटे गये इस दस्तावेज़ को भगतसिंह और अन्य साथियों से विचार-विमर्श के बाद मुख्य रूप से भगवतीचरण वोहरा ने लिखा था। दुर्गा भाभी और दूसरे क्रान्तिकारी साथियों ने इसे वहाँ वितरित किया। सी.आई.डी. ने इसे ज़ब्त कर लिया था और उसी के काग़ज़ों से इसकी प्रति मिली।
स्वतन्त्रता का पौधा शहीदों के रक्त से फलता है। भारत में स्वतन्त्रता का पौधा फलने के लिए दशकों से क्रान्तिकारी अपना रक्त बहाते रहे हैं। बहुत कम लोग हैं जो उनके मन में पाले हुए आदर्शों की उच्चता तथा उनके महान बलिदानों पर प्रश्नचिह्न लगायें, लेकिन उनकी कार्रवाइयाँ गुप्त होने की वजह से उनके वर्तमान इरादे और नीतियों के बारे में देशवासी अँधेरे में हैं, इसलिए हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन ने यह घोषणापत्र जारी करने की आवश्यकता महसूस की है।
विदेशियों की ग़ुलामी से भारत की मुक्ति के लिए यह एसोसिएशन सशस्त्र संगठन द्वारा भारत में क्रान्ति के लिए दृढ़ संकल्प है। ग़ुलाम रखे हुए लोगों की ओर से स्पष्ट तौर पर विद्रोह से पूर्व गुप्त प्रचार और गुप्त तैयारियाँ होनी आवश्यक हैं। जब देश क्रान्ति की उस अवस्था में आ जाता है तब विदेशी सरकार के लिए उसे रोकना कठिन हो जाता है। वह कुछ देर तक तो इसके सामने टिक सकती है, लेकिन उसका भविष्य सदा के लिए समाप्त हो चुका होता है। मानवीय स्वभाव भ्रमपूर्ण और यथास्थितिवादी होने के कारण क्रान्ति से एक प्रकार का भय प्रकट करता है। सामाजिक परिवर्तन सदा ही ताक़त और विशेष सुविधाएँ माँगने वालों के लिए भय पैदा करता है। क्रान्ति एक ऐसा करिश्मा है जिसे प्रकृति स्नेह करती है और जिसके बिना कोई प्रगति नहीं हो सकती – न प्रकृति में और न ही इन्सानी कारोबार में। क्रान्ति निश्चय ही बिना सोची-समझी हत्याओं और आगजनी की दरिन्दा मुहिम नहीं है और न ही यहाँ-वहाँ चन्द बम फेंकना और गोलियाँ चलाना है; और न ही यह सभ्यता के सारे निशान मिटाने तथा समयोचित न्याय और समता के सिद्धान्त को ख़त्म करना है। क्रान्ति कोई मायूसी से पैदा हुआ दर्शन भी नहीं और न ही सरफ़रोशों का कोई सिद्धान्त है। क्रान्ति ईश्वर-विरोधी हो सकती है लेकिन मनुष्य-विरोधी नहीं। यह एक पुख़्ता और ज़िन्दा ताक़त है। नये और पुराने के, जीवन और ज़िन्दा मौत के, रोशनी और अँधेरे के आन्तरिक द्वन्द्व का प्रदर्शन है, कोई संयोग नहीं है। न कोई संगीतमय एकसारता है और न ही कोई ताल है, जो क्रान्ति के बिना आयी हो। ‘गोलियों का राग’ जिसके बारे में कवि गाते आये हैं, सच्चाई रहित हो जायेगा अगर क्रान्ति को समूची सृष्टि में से ख़त्म कर दिया जाये। क्रान्ति एक नियम है, क्रान्ति एक आदर्श है और क्रान्ति एक सत्य है।
हमारे देश के नौजवानों ने इस सत्य को पहचान लिया है। उन्होंने बहुत कठिनाइयाँ सहते हुए यह सबक सीखा है कि क्रान्ति के बिना – अफरा-तफरी, क़ानूनी गुण्डागर्दी और नफ़रत की जगह, जो आजकल हर ओर फैली हुई है – व्यवस्था, क़ानूनपरस्ती और प्यार स्थापित नहीं किया जा सकता। हमारी सर्वसम्पन्न धरती पर किसी को ऐसा विचार नहीं आना चाहिए कि हमारे नौजवान ग़ैर-ज़िम्मेदार हैं। वे पूरी तरह जानते हैं कि वे कहाँ खड़े हैं। उनसे बढ़कर किसे मालूम है कि उनकी राह कोई फूलों की सेज नहीं है। समय-समय पर उन्होंने अपने आदर्शों के लिए बहुत बड़ी क़ीमत चुकायी है। इस कारण किसी के मुँह से यह नहीं निकलना चाहिए कि नौजवान उतावलेपन में किन्हीं मामूली बातों के पीछे लगे हुए हैं।
यह कोई अच्छी बात नहीं है कि हमारे आदर्शों पर कीचड़ उछाला जाता है। यह काफ़ी होगा अगर आप जानें कि हमारे विचार बेहद मज़बूत और तेज़-तर्रार हैं जो न सिर्फ़ हमें आगे बढ़ाये रखते हैं बल्कि फाँसी के तख़्ते पर भी मुस्कुराने की हिम्मत देते हैं।
आजकल यह फ़ैशन.सा हो गया है कि अहिंसा के बारे में अन्धाधुन्ध और निरर्थक बात की जाये। महात्मा गाँधी महान हैं और हम उनके सम्मान पर कोई भी आँच नहीं लाने देना चाहते, लेकिन हम यह दृढ़ता से कहते हैं कि हम देश को स्वतन्त्र कराने के उनके ढंग को पूर्णतया नामंजूर करते हैं। यदि हम देश में चलाये जा रहे उनके असहयोग आन्दोलन द्वारा लोक-जागृति में उनकी भागीदारी के लिए उनको सलाम न करें तो यह हमारे लिए बड़ा नाशुक्रापन होगा। परन्तु हमारे लिए महात्मा असम्भवताओं के दार्शनिक हैं। अहिंसा भले ही एक नेक आदर्श है लेकिन यह अतीत की चीज़ है। जिस स्थिति में आज हम हैं, सिर्फ़ अहिंसा के रास्ते से कभी भी आज़ादी प्राप्त नहीं कर सकते। दुनिया सिर से पाँव तक हथियारों से लैस है और (ऐसी) दुनिया पर हम हावी है। अमन की सारी बातें ईमानदार हो सकती हैं, लेकिन हम जो ग़ुलाम क़ौम हैं, हमें ऐसे झूठे सिद्धान्तों के जरिये अपने रास्ते से नहीं भटकना चाहिए। हम पूछते हैं कि जब दुनिया का वातावरण हिंसा और ग़रीब की लूट से भरा हुआ है, तब देश को अहिंसा के रास्ते पर चलाने का क्या तुक है? हम अपने पूरे ज़ोर के साथ कहते हैं कि क़ौम के नौजवान कच्ची नींद के ऐसे सपनों से रिझाये नहीं जा सकते।
हम हिंसा में विश्वास रखते हैं – अपनेआप में अन्तिम लक्ष्य के रूप में नहीं, बल्कि एक नेक परिणाम तक पहुँचने के लिए अपनाये गये तौर-तरीक़े के नाते। अहिंसा के पैरोकार और सावधानी के वकील यह बात तो मानते हैं कि हम अपने यक़ीन पर चलने और उसके लिए कष्ट सहने के लिए तैयार रहते हैं। तो क्या हमें इसीलिए अपने साथियों की साझी माँ की बलिवेदी पर क़ुर्बानियों की गिनती करानी पड़ेगी? अंग्रेज़ सरकार की जेलों की चारदीवारी के अन्दर रूह कँपा देने और दिल की धड़कन रोक देने वाले कई दृश्य खेले जा चुके हैं। हमें हमारी आतंकवादी नीति के कारण कई बार सज़ाएँ हुई हैं। हमारा जवाब है कि क्रान्तिकारियों का मुद्दा आतंकवाद नहीं होता; तो भी हम यह विश्वास रखते हैं कि आतंकवाद के रास्ते ही क्रान्ति आ जायेगी। पर इसमें कोई शक नहीं है कि क्रान्तिकारी बिल्कुल दुरुस्त सोचते हैं कि अंग्रेज़ी सरकार का मुँह मोड़ने के लिए इन तरीक़ों का इस्तेमाल करना ही कारगर तरीक़ा है। अंग्रेज़ों की सरकार इसलिए चलती है, क्योंकि वे सारे भारत को भयभीत करने में क़ामयाब हुए हैं। हम इस सरकारी दहशत का किस तरह मुक़ाबला करें? सिर्फ़ क्रान्तिकारियों की ओर से मुक़ाबले की दहशत ही उनकी दहशत को रोकने में क़ामयाब हो सकती है। समाज में एक लाचारी की गहरी भावना फैली हुई है। इस ख़तरनाक मायूसी को कैसे दूर किया जाये? सिर्फ़ क़ुर्बानी की रूह को जगाकर खोये आत्मविश्वास को जगाया जा सकता है। आतंकवाद का एक अन्तरराष्ट्रीय पहलू भी है। इंग्लैण्ड के काफ़ी शत्रु हैं जो हमारी ताक़त के पूर्ण प्रदर्शन से हमारी सहायता करने को तैयार हैं। यह भी एक बड़ा लाभ है।
भारत साम्राज्यवाद के जुवे के नीचे पिस रहा है। इसमें करोड़ों लोग आज अज्ञानता और ग़रीबी के शिकार हो रहे हैं। भारत की बहुत बड़ी जनसंख्या जो मज़दूरों और किसानों की है, उनको विदेशी दबाव एवं आर्थिक लूट ने पस्त कर दिया है। भारत के मेहनतकश वर्ग की हालत आज बहुत गम्भीर है। उसके सामने दोहरा ख़तरा है – विदेशी पूँजीवाद का एक तरफ़ से और भारतीय पूँजीवाद के धोखे भरे हमले का दूसरी तरफ़ से। भारतीय पूँजीवाद विदेशी पूँजी के साथ हर रोज़ बहुत से गँठजोड़ कर रहा है। कुछ राजनीतिक नेताओं का डोमिनियन (प्रभुतासम्पन्न) का दर्जा स्वीकार करना भी हवा के इसी रुख को स्पष्ट करता है।
भारतीय पूँजीपति भारतीय लोगों को धोखा देकर विदेशी पूँजीपति से विश्वासघात की क़ीमत के रूप में सरकार में कुछ हिस्सा प्राप्त करना चाहता है। इसी कारण मेहनतकश की तमाम आशाएँ अब सिर्फ़ समाजवाद पर टिकी हैं और सिर्फ़ यही पूर्ण स्वराज्य और सब भेदभाव ख़त्म करने में सहायक साबित हो सकता है। देश का भविष्य नौजवानों के सहारे है। वही धरती के बेटे हैं। उनकी दुख सहने की तत्परता, उनकी बेख़ौफ़ बहादुरी और लहराती क़ुर्बानी दर्शाती है कि भारत का भविष्य उनके हाथ में सुरक्षित है। एक अनुभूतिमय घड़ी में देशबन्धु दास ने कहा था, “नौजवान भारतमाता की शान एवं आशाएँ हैं। आन्दोलन के पीछे उनकी प्रेरणा है, उनकी क़ुर्बानी है और उनकी जीत है। आज़ादी की राह पर मशालें लेकर चलने वाले ये ही हैं। मुक्ति की राह पर ये तीर्थयात्री हैं।”
भारतीय रिपब्लिक के नौजवानो, नहीं सिपाहियो, क़तारबद्ध हो जाओ। आराम के साथ न खड़े रहो और न ही निरर्थक क़दमताल किये जाओ। लम्बी दरिद्रता को, जो तुम्हें नाकारा कर रही है, सदा के लिए उतार फेंको। तुम्हारा बहुत ही नेक मिशन है। देश के हर कोने और हर दिशा में बिखर जाओ और भावी क्रान्ति के लिए, जिसका आना निश्चित है, लोगों को तैयार करो। फ़र्ज़ के बिगुल की आवाज़ सुनो। वैसे ही ख़ाली ज़िन्दगी न गँवाओ। बढ़ो, तुम्हारी ज़िन्दगी का हर पल इस तरह के तरीक़े और तरतीब ढूँढ़ने में लगना चाहिए, कि कैसे अपनी पुरातन धरती की आँखों में ज्वाला जागे और एक लम्बी अंगड़ाई लेकर वह जाग उठे। अंग्रेज़ साम्राज्य के ख़िलाफ़ नवयुवकों के उर्वर हृदयों में एक उकसाहट और नफ़रत भर दो, ऐसे बीज डालो जोकि उगें और बड़े वृक्ष बन जायें क्योंकि इन बीजों को तुम अपने गर्म ख़ून के जल से सींचोगे। तब एक भयानक भूचाल आयेगा, जो बड़े धमाके से ग़लत चीज़ों को नष्ट कर देगा और साम्राज्यवाद के महल को कुचलकर धूल में मिला देगा और यह तबाही महान होगी।
तब, और सिर्फ़ तभी, एक भारतीय क़ौम जागेगी, जो अपने गुणों और शान से इन्सानियत को हैरान कर देगी। तब चालाक और बलवान सदा से कमज़ोर लोगों से हैरान रह जायेंगे। तभी व्यक्तिगत मुक्ति भी सुरक्षित होगी और मेहनतकश की सरदारी और प्रभुसत्ता को सत्कारा जायेगा। हम ऐसी ही क्रान्ति के आने का सन्देश दे रहे हैं। क्रान्ति अमर रहे!
– करतार सिंह[*], अध्यक्ष
(1929) रिपब्लिकन प्रेस, अरहवन, भारत से प्रकाशित।
[*](भगतसिंह का छद्म नाम)
Sunday, 26 February 2017
Morbid Inequality: Now Just SIX Men Have as Much Wealth as Half the World's Population @alternet
Morbid Inequality: Now Just SIX Men Have as Much Wealth as Half the World's Population @alternet: The world's total wealth is about $256 trillion, and in just one year the richest 10% drained nearly $4 trillion away from the rest of civilization.
Morbid Inequality: Now Just SIX Men Have as Much Wealth as Half the World's Population
"That's worth a second look. The world's total wealth is about $256 trillion, and in JUST ONE YEAR the richest 10% drained nearly $4 trillion away from the rest of civilization."
And
".... the National Review refer to "a growing upper-middle class" of people earning over $100,000 a year, they're inadvertently offering an explanation for the demise of the middle class: Some are moving up, way up; many others are dropping to the lower-middle-class or below. The once sizable and stable middle of America is splitting into two."
We always knew it, may be not so accurate, that capitalism breeds unemployment & poverty, despite rise of wealth astronomically. It creates hunger & famine, despite grains rotting in godowns. Ignorance & superstition rise inspite of science rising to a great height. War & terrorism is byproduct of capitalist mode of production. Child abuse & women becoming commodity is part of the 'need' of capital to grow, without which it will demise, and there is no other way than sucking lifeline of the wealth producers!
So what? In 1920s US apologists of capitalism claimed that they have generated enough wealth & now poverty will be eliminated! They are generating enough wars, one almost every year to capture world market and natural resources, in addition to terrorism; insatiable greed of more & more!
Still the philistines are against making private property social, they feel their 'democracy' will be abolished; cannot be more superstitious idea that this as they have neither private property nor any freedom!
Solution? If you have read upto this point, find out one, but be sure, please do not think of reform in present, which has seen more than 1000s of deaths of reformist idea & programme, as they are meant to serve the present social, economic, political order, like Social Democrats, 21 Century Socialism, Partyless Socialism, Anarchism, etc!
Morbid Inequality: Now Just SIX Men Have as Much Wealth as Half the World's Population
"That's worth a second look. The world's total wealth is about $256 trillion, and in JUST ONE YEAR the richest 10% drained nearly $4 trillion away from the rest of civilization."
And
".... the National Review refer to "a growing upper-middle class" of people earning over $100,000 a year, they're inadvertently offering an explanation for the demise of the middle class: Some are moving up, way up; many others are dropping to the lower-middle-class or below. The once sizable and stable middle of America is splitting into two."
We always knew it, may be not so accurate, that capitalism breeds unemployment & poverty, despite rise of wealth astronomically. It creates hunger & famine, despite grains rotting in godowns. Ignorance & superstition rise inspite of science rising to a great height. War & terrorism is byproduct of capitalist mode of production. Child abuse & women becoming commodity is part of the 'need' of capital to grow, without which it will demise, and there is no other way than sucking lifeline of the wealth producers!
So what? In 1920s US apologists of capitalism claimed that they have generated enough wealth & now poverty will be eliminated! They are generating enough wars, one almost every year to capture world market and natural resources, in addition to terrorism; insatiable greed of more & more!
Still the philistines are against making private property social, they feel their 'democracy' will be abolished; cannot be more superstitious idea that this as they have neither private property nor any freedom!
Solution? If you have read upto this point, find out one, but be sure, please do not think of reform in present, which has seen more than 1000s of deaths of reformist idea & programme, as they are meant to serve the present social, economic, political order, like Social Democrats, 21 Century Socialism, Partyless Socialism, Anarchism, etc!
Tuesday, 14 February 2017
भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव: 23 मार्च, 1931 को फांसी दे कर उन तीनों की हत्या कर दी गई।
भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को सांडर्स हत्या कांड में7 मई 1929 को मुकद्दमा शुरू हुआ.
6 जून 1929 को भगत सिंह जी ने अपने विचार जज के सामने रखते हुए क्रान्ति और आजादी की आवश्यकता पर प्रकाश डाला.
26 मई 1930 को उन्हें अंग्रेजो ने दोषी करार दिया।
7 अक्टूबर 1930 को उन तीनों को मृत्यु दंड की सजा सुनाई गई.
नवम्बर 1930 को प्रिवी परिषद में अपील की गई.
10 जनवरी 1931 को अपील खारिज की गई.
24 मार्च 1931 को फांसी दी जाना थी.
लेकिन जन आक्रोश को देखते हुए एक दिन पूर्व 23 मार्च को फांसी दे कर उन तीनों की हत्या कर दी गई।
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